लघु कथा लेखन
परिभाषा
जीवन की किसी एक घटना के रोचक वर्णन को ‘कहानी’ कहते हैं।- कहानी सुनने, पढ़ने और लिखने की एक लम्बी परम्परा हर देश में रही है; क्योंकि यह सबके लिए मनोरंजक होती है। बच्चों को कहानी सुनने का बहुत चाव होता है। दादी और नानी की कहानियाँ प्रसिद्ध हैं। इन कहानियों का उद्देश्य मुख्यतः मनोरंजन होता है किन्तु इनसे कुछ-न-कुछ शिक्षा भी मिलती है।
- कहानी लिखना एक कला है। हर कहानी-लेखक अपने ढंग से कहानी लिखकर उसमें विशेषता पैदा कर देता है। वह अपनी कल्पना और वर्णन-शक्ति से कहानी के कथानक, पात्र या वातावरण को प्रभावशाली बना देता है। लेखक की भाषा-शैली पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है कि कहानी कितनी अच्छी लिखी गई है।
कहानी-लेखन के प्रकार
आकार की दृष्टि से ये कहानियाँ दोनों तरह की हैं- कुछ कहानियाँ लम्बी हैं जबकि अन्य कुछ कहानियाँ छोटी। आधुनिक कहानी मूलतः छोटी होती है।कहानी लिखते समय निम्नलिखित बातों पर ध्यान रखना चाहिए
- दी गई रूपरेखा अथवा संकेतों के आधार पर ही कहानी का विस्तार करना चाहिए।
- कहानी में विभिन्न घटनाओं और प्रसंगों को संतुलित विस्तार देना चाहिए। किसी प्रसंग को न बहुत अधिक संक्षिप्त लिखना चाहिए, न अनावश्यक रूप से बहुत अधिक बढ़ाना चाहिए।
- कहानी का आरम्भ आकर्षक होना चाहिए ताकि कहानी पढ़ने वाले का मन उसे पढ़ने में लगा रहे।
- कहानी की भाषा सरल, स्वाभाविक तथा प्रभावशाली होनी चाहिए। उसमें बहुत अधिक कठिन शब्द तथा लम्बे वाक्य नहीं होनी चाहिए।
- कहानी को उपयुक्त एवं आकर्षक शीर्षक देना चाहिए।
- कहानी को प्रभावशाली और रोचक बनाने के लिए मुहावरों व् लोकोक्तियों का प्रयोग भी किया जा सकता है
- कहानी हमेशा भूतकाल में ही लिखी जानी चाहिए।
- कहानी का अंत सहज ढंग से होना चाहिए।
- अंत में कहानी से मिलने वाली सीख स्पष्ट व् संक्षिप्त होनी चाहिए।
कहानी लेखन की प्रमुख विशेषताएँ
कहानी लेखन की निम्नलिखित विशेषताएँ है-- आज कहानी का मुख्य विषय मनुष्य है, देव या दानव नहीं। पशुओं के लिए भी कहानी में अब कोई जगह नहीं रही। हाँ, बच्चों के लिए लिखी गयी कहानियों में देव, दानव, पशु-पक्षी, मनुष्य सभी आते हैं। लेकिन श्रेष्ठ कहानी उसी को कहते है, जिसमें मनुष्य के जीवन की कोई समस्या या संवेदना व्यक्त की गई होती है।
- पहले कहानी शिक्षा और मनोरंजन के लिए लिखी जाती थी, आज इन दोनों के स्थान पर कौतूहल जगाने में जो कहानी सक्षम हो, वही सफल समझी जाती है। फिर भी, मनोरंजन आज भी साधारण पाठकों की माँग है।
- आज का मनुष्य यह जानने लगा है कि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता है, वह किसी के हाथ का खिलौना नहीं। इसीलिए आज की कहानियों का आधार मनुष्य के जीवन का संघर्ष है।
- आज की कहानी का लक्ष्य विभिन्न प्रकार के चरित्रों की सृष्टि करना है। यही कारण है कि आज कहानी में चरित्र-चित्रण का महत्त्व अधिक बढ़ा है।
- पहले जहाँ कहानी का लक्ष्य घटनाओं का जमघट लगाना होता था, वहाँ आज घटनाओं को महत्त्व न देकर मानव-मन के किसी एक भाव, विचार और अनुभूति को व्यक्त करना है। प्रेमचन्द ने इस सम्बन्ध में स्पष्ट लिखा है, ”कहानी का आधार अब घटना नहीं, अनुभूति है।”
- प्राचीन कहानी समष्टिवादी थी। सबके हितों को ध्यान में रखकर लिखी जाती थी। आज की कहानी व्यक्तिवादी है, जो व्यक्ति के ‘मनोवैज्ञानिक सत्य’ का उद्घाटन करती है।
- पहले की उपेक्षा आज की कहानी भाषा की सरलता पर अधिक बल देती है; क्योंकि उसका उद्देश्य जीवन की गाँठों को खोलना है।
- पुरानी कहानियों का अंत अधिकतर सुखद होता था, किन्तु आज की कहानियाँ मनुष्य की दुःखान्तक कथा को, उसकी जीवनगत समस्याओं और अन्तहीन संघर्षों को अधिक-से-अधिक प्रकाशित करती हैं।
कहानी-लेखन की विधियाँ
- कहानी की सहायता या आधार पर कहानी लिखना
- रूपरेखा के सहारे कहानी लिखना
- अधूरी या अपूर्ण कहानी को पूर्ण करना
- चित्रों की सहायता से कहानी का अभ्यास करना।
1. कहानी की सहायता या आधार पर कहानी लिखना–
मूल कहानी को ध्यान से पढ़कर कहानी लिखने का अभ्यास किया जाना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि कहानी को खूब ध्यान से पढ़ा जाए, उसकी प्रमुख बातों या चरित्रों या घटनाओं को अलग कागज पर संकेत-रूप में लिख लिया जाए और फिर अपनी भाषा में मूल कहानी को इस तरह लिखा जाए कि कोई भी महत्त्वपूर्ण बात या घटना या प्रसंग छूटने न पाए। इस प्रकार की कहानी लिखते समय छात्रों को निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए-
(i) कहानी का आरम्भ आकर्षक ढंग से हो
(ii) संवाद छोटे-छोटे हों
(iii) कहानी का क्रमिक विकास हो
(iv) उसका अन्त स्वाभाविक हो
(v) कहानी का शीर्षक मूल कहानी का शीर्षक हो
(vi) भाषा सरल और सुबोध हो।
इनके आधार पर छात्रों से कहानी लिखने का अभ्यास कराया जाना चाहिए।
2. रूपरेखा (संकेतों) के सहारे कहानी लिखना –
रूपरेखा या दिए गये संकेतों के आधार पर कहानी लिखना कठिन भी है, सरल भी। कठिन इसलिए कि संकेत अधूरे होते हैं। इसके लिए कल्पना और मानसिक व्यायाम करने की आवश्यकता पड़ती है। सरल इसलिए कि कहानी के संकेत पहले से दिए रहते हैं। यहाँ केवल खानापुरी करनी होती है। लेकिन, इस प्रकार की कहानी लिखने के लिए कल्पना से अधिक काम लेना पड़ता है। ऐसी कहानी लिखने में वे ही छात्र अपनी क्षमता का परिचय दे सकते है, जिनमें सर्जनात्मक और कल्पनात्मक शक्ति अधिक होती है। इसके लिए छात्र को संवेदनशील और कल्पनाप्रवण होना चाहिए। एक उदाहरण इस प्रकार है-
संकेत
एक किसान के लड़के लड़ते, किसान मरने के निकट, सबको बुलाया, लकड़ियों को तोड़ने को दिया, किसी से न टूटा, एक-एक कर लकड़ियों तोड़ी, शिक्षा।
उपर्युक्त संकेतों को पढ़ने और थोड़ी कल्पना से काम लेने पर पूरी कहानी इस प्रकार बन जाएगी-
एकता में बल
एक था किसान। उसके चार लड़के थे। पर उन लड़कों में मेल नहीं था। वे आपस में बराबर लड़ते-झगड़ते रहते थे। एक दिन किसान बहुत बीमार पड़ा। जब वह मृत्यु के निकट पहुँच गया, तब उसने अपने चारों लड़कों को बुलाया और मिल-जुलकर रहने की शिक्षा दी।
किन्तु लड़कों पर उसकी बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। तब किसान ने लकड़ियों का गट्ठर माँगवाया और लड़कों को तोड़ने को कहा। किसी से वह गट्ठर न टूटा। फिर, लकड़ियाँ गट्ठर से अलग की गयीं।
किसान ने अपने सभी लड़कों को बारी-बारी से बुलाया और लकड़ियों को अलग-अलग तोड़ने को कहा। सबने आसानी से लकड़ियों को तोड़ दिया। अब लड़कों की आँखें खुलीं। तभी उन्होंने समझा कि आपस में मिल-जुलकर रहने में कितना बल है।
3. अपूर्ण कहानी को पूर्ण करना
छात्रों में कल्पना-शक्ति जगाने के लिए ऐसी कहानी लिखने का भी अभ्यास कराया जाता है, जो अधूरी या अपूर्ण है। उसको पूरा करना है। इसके लिए आवश्यक है कि अपूर्ण कहानी को ध्यान से पढ़ाया जाए, उसके क्रमों को समझाया जाए और उनमें परस्पर सम्बन्ध बनाते हुए सर्जनात्मक कल्पना के सहारे अधूरी कहानी को पूरा करने का अभ्यास कराया जाए। एक उदाहरण इस प्रकार है-
कौए ने गाना सुनाने के लिए ज्योंही अपनी चोंच खोली, रोटी का टुकड़ा उसके मुँह से गिर गया। रोटी का टुकड़ा ले लोमड़ी हँस-हँसकर खाने लगी और कौआ अपनी मूर्खता पर पछताने लगा।
अब अगर दूसरी बार कौआ मांस का टुकड़ा ले आए, तो लोमड़ी क्या करेगी? इस अपूर्ण कहानी को पूरा करें। यहाँ छात्र को कल्पना-शक्ति के सहारे शेष कहानी को पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। शेष कहानी के अनेक रूप हो सकते है। यह छात्रों की कल्पना पर छोड़ा जा सकता है।
4. चित्रों की सहायता से कहानी लिखना –
चित्र भाव या विचार को जगाते हैं इनसे हमारी कल्पना-शक्ति जगती है। छात्रों में भाव और कल्पना-शक्ति को जगाने के लिए दिए गए चित्रों की सहायता से पूरी कहानी तैयार करने का अभ्यास कराया जाना चाहिए। एक उदाहरण इस प्रकार है-
मूर्ख बन्दर
एक सेठ था। उसने एक बन्दर पाला था। बन्दर सेठ से बहुत अधिक मिल कर रहता था। सेठ बन्दर को बहुत बुद्धिमान समझता था, पर बन्दर तो बन्दर ही ठहरा। एक दिन की बात है। गर्मी के दिन में सेठ गहरी नींद सो रहा था। बन्दर उसे पंखा हिला रहा था। एक मक्खी उड़कर आयी और सेठ के नाक पर बैठ गयी। बन्दर बार-बार उस मक्खी को पंखे से उड़ाता, पर मक्खी बार-बार सेठ के नाक पर बैठ जाती। अन्त में बन्दर से नहीं रहा गया। बाहर से वह पत्थर का एक बड़ा-सा टुकड़ा ले आया। इस बार मक्खी सेठ की नाक पर बैठी तो बन्दर ने उसी समय पत्थर के टुकड़े से उसे जोर से मारा। मक्खी तो उड़ गयी, पर बेचारे सेठ की नाक टूट गयी।
बिना विचारे जो करे
अपरीक्ष्य न कर्त्तव्यं कर्त्तव्यं सुपरीक्षितम् ।
पश्चात् भवति संतापो ब्राह्मण्या नकुलार्थतः ।।
अपरीक्षित काम का परिणाम बुरा होता है
एक बार देवशर्मा नाम के ब्राह्मण के घर जिस दिन पुत्र का जन्म हुआ उसी दिन उसके घर में रहने वाली नकुली ने भी एक नेवले को जन्म दिया। देवशर्मा की पत्नी बहुत दयालु स्वभाव की स्त्री थी। उसने उस छोटे नेवले को भी अपने पुत्र के समान ही पाल-पोसा और बड़ा किया। वह नेवला सदा उसके पुत्र के साथ खेलता था। दोनों में बड़ा प्रेम था। देवशर्मा की पत्नी भी दोनों के प्रेम को देखकर प्रसन्न थी। किन्तु, उसके मन में यह शंका हमेशा रहती थी कि कभी यह नेवला उसके पुत्र को न काट खाये। पशु के बुद्धि नहीं होती, मूर्खतावश वह कोई भी अनिष्ट कर सकता है।
एक दिन उसकी इस आशंका का बुरा परिणाम निकल आया। उस दिन देवशर्मा की पत्नी अपने पुत्र को एक वृक्ष की छाया में सुलाकर स्वयं पास के जलाशय से पानी भरने गई थी। जाते हुए वह अपने पति देवशर्मा से कह गई थी कि वहीं ठहर कर वह पुत्र की देख-रेख करे, कहीं ऐसा न हो कि नेवला उसे काट खाये। पत्नी के जाने के बाद देवशर्मा ने सोचा, 'नेवले और बच्चे में गहरी मैत्री है, नेवला बच्चे को हानि नहीं पहुँचायेगा।' यह सोचकर वह अपने सोये हुए बच्चे और नेवले को वृक्ष की छाया में छोड़कर स्वयं भिक्षा के लोभ से कहीं चल पड़ा ।
दैववश उसी समय एक काला नाग पास के बिल से बाहिर निकला। नेवले ने उसे देख लिया। उसे डर हुआ कि कहीं यह उसके मित्र को न डस ले, इसलिये वह काले नाग पर टूट पड़ा, और स्वयं बहुत क्षत-विक्षत होते हुए भी उसने नाग के खंड-खंड कर दिये। सांप को मारने के बाद वह उसी दिशा में चल पड़ा, जिधर देवशर्मा की पत्नी पानी भरने गई थी। उसने सोचा कि वह उसकी वीरता की प्रशंसा करेगी, किन्तु हुआ इसके विपरीत। उसकी खून से सनी देह को देखकर ब्राह्मण पत्नी का मन उन्हीं पुरानी आशंकाओं से भर गया कि कहीं इसने उसके पुत्र की हत्या न कर दी हो। यह विचार आते ही उसने क्रोध से सिर पर उठाये घड़े को नेवले पर फैंक दिया । छोटा सा नेवला जल से भारी घड़े की चोट खाकर वहीं मर गया। ब्राह्मण-पत्नी वहाँ से भागती हुई वृक्ष के नीचे पहुँची। वहाँ पहुँचकर उसने देखा कि उसका पुत्र बड़ी शान्ति से सो रहा है, और उससे कुछ दूरी पर एक काले साँप का शरीर खँड-खँड हुआ पड़ा है। तब उसे नेवले की वीरता का ज्ञान हुआ। पश्चात्ताप से उसकी छाती फटने लगी।
इसी बीच ब्राह्मण देवशर्मा भी वहाँ आ गया। वहाँ आकर उसने अपनी पत्नी को विलाप करते देखा तो उसका मन भी सशंकित हो गया। किन्तु पुत्र को कुशलपूर्वक सोते देख उसका मन शान्त हुआ। पत्नी ने अपने पति देवशर्मा को रोते-रोते नेवले की मृत्यु का समाचार सुनाया और कहा- "मैं तुम्हें यहीं ठहर कर बच्चे की देख-भाल के लिये कह गई थी। तुमने भिक्षा के लोभ से मेरा कहना नहीं माना। इसी से यह परिणाम हुआ। मनुष्य को अतिलोभ नहीं करना चाहिये। अतिलेभ से कई बार मनुष्य के मस्तक पर चक्र लग जाता है।”
ब्राह्मण ने पूछा- “यह कैसे?”
ब्राह्मणी ने तब निम्न कथा सुनाई-
सीख:
बिना विचारे जो करे सो पाछे पछताय ।
लालच बुरी बला है
एक पिता अपने दोनों बेटों से बहुत प्यार करते थे। यह सोच कि शहर चले जाएँ तो दोनों बेटों का भविष्य उज्जवल हो जाएगा, उन्होंने अपना पुश्तेनी घर बेच दिया। गांव में चोरियाँ बहुत हो रही थी इस लिए वो सारा पैसा उन्होंने एक खेत में गाड़ दिया। घर पहुँच कर घर बेचने की बात दोनों बेटों को बताई और यह भी बताया कि घर का नया मालिक एक दो दिन में यहाँ रहने आ जाएगा। इस लिए तैयारी करो शहर चलने की।
घर बिकने की बात सुन दोनों बेटों के मन में खोट आ गया। दोनों सोचने लगे की क्यों न मैं ही सारा पैसा हड़प लूँ। तरकीब सोचते हुए दोनों अपने पिता के पास गए और पूछा ” पर पैसा तो आप लाए नहीं।” पिता ने उत्तर दिया ” अरे, सारे पैसे मेरे पास हैं, तुम दोनों चिंता मत करो।”
रात को बड़ा बेटा उठा और सोते हुए पिता के सामान की तलाशी लेने लगा। तभी छोटा बेटा भी वहाँ पैसा ढूँढ़ते हुए पहुँच गया। एक दूसरे को देख दोनों घबरा गए। तब फुसफुसाते हुए दोनों ने तय
किया कि इस बूढ़े पिता को साथ ले जा कर क्या करेंगे। क्यों न हम दोनों मिल कर पैसा ढूंढे। जब पैसा मिल जाएगा तो उसका बराबर बँटवारा कर शहर भाग जाएंगे।
उन्हें पता ही नहीं चला, पिता की नींद खुल गयी थी और वो उनकी सारी बातें सुन रहे थे। अपनी पत्नी की मौत के बाद इतने प्यार से पाला था इन दोनों बेटों को और आज वही उसे धोखा दे रहे हैं।
अगले दिन उन्होंने सारा पैसा जमीन से निकाला और एक वृद्ध आश्रम को दान कर दिया। वो अपने बेटों की घृणित सोच से इतने दुखी हुए की उन्होंने फ़ौरन घर छोड़ दिया और साधू का वेश धारण कर गाँव से हमेशा के लिए चले गए। दूसरे दिन नया मकान मालिक आया और उसने दोनों बेटों को घर से निकाल दिया। अब दोनों के पास ना पिता था, ना घर था, और ना ही पैसा।
देखा आपने, लालच की वजह से दोनों के हाथ से पैसा भी गया और पिता का प्यार भी। तभी कहते हैं ” लालच बुरी बला है “
जैसी करनी वैसी भरनी
एक बार की बात है। जंगल में एक लोमड़ी किसी शिकारी के जाल में फंस गई। वह दर्द से कराह रही थी। उसने अपने बहुत कोशिश की लेकिन उसे और भी ज्यादा दर्द हो रहा था। लोमड़ी की चीखती हुई आवाज पास में ही एक तालाब में एक बगुले को सुनाई दी। बगुला उड़ते हुए उसके पास पहुँचा और अपनी लंबी चोंच से बार बार जाल पर मारकर तोड़ दिया।
इससे लोमड़ी शिकारी जाल से आजाद हो गई। लोमड़ी ने उस बगुले को धन्यवाद किया और बगुले से बोली, तुमने आज मेरी जान बचाई है। दोस्त क्या तुम आज शाम को मेरे घर पर खाना खाने आओगे। बगुले ने जवाब दिया हाँ दोस्त जरुर में आज शाम को तुम्हारे घर आ जाऊँगा।
शाम हुई। बगुला लोमड़ी के घर के रास्ते चल पड़ा। थोड़ी देर बाद वह लोमड़ी के घर पहुँच गया। लोमड़ी ने बगुले का अभिवादन किया और बैठाया और बोला कि, दोस्त तुम यहाँ बैठो में खाना लेकर आता हूँ। अब आपको तो पता है कि लोमड़ी बड़ी चालक होती है। उस लोमड़ी ने आज बगुले के साथ मजाक करने की सोची। लोमड़ी ने जानबुझकर दोनों के लिए खाना थाली में परोसा।
लोमड़ी ने तो थाली में रखा खाना खा लिया। लेकिन भला बगुला कैसे थाली में खाना खाता। उस शाम बिचारा बगुला भूखा ही रह गया। बगुला लोमड़ी के किए पर शांत रहा और लोमड़ी को बोला दोस्त तुमने बहुत अच्छी तरह से मेहमाननवाजी की है। कृपया मुझे भी मेहमाननवाजी का मौका दीजिए।
इस तरह बगुले ने भी लोमड़ी को दावत पर बुलाया। लोमड़ी बड़ी खुश हुई। लोमड़ी रास्ते में सोचने लगी आज तो डबल डबल दावत खाने को मिल रहा है क्या बात है। आज तो मजा ही आ गया। लोमड़ी बगुले के यहाँ पहुँची। बगुले ने उसी तरह लोमड़ी का अभिवादन किया और बैठाया और बोला दोस्त तुम यही बैठो में खाना लगाता हूँ। बगुले ने लोमड़ी से अपना बदला लेने की सोची। उसने भी जानबुझकर दोनों के लिए एक सुराही में खाना लगाया।
भाई बगुले ने तो आसानी से सुराही में चोंच डालकर दावत का मजा ले लिया। लेकिन इसबार बेचारी लोमड़ी भूखी ही रह गई। क्योंकि उसका मुहँ सुराही में जा ही नही रहा था। तब लोमड़ी को इस बात का अहसास हुआ कि जैसे मैंने बगुले के साथ किया था वह मेरी भी साथ हुआ और लोमड़ी ने बगुले से माफ़ी माँगी। अब लोमड़ी को समझ में आ गया कि जैसी करनी वैसी भरनी।
सीख: जो दूसरों के साथ बुरा व्यवहार करता है, उसके साथ वैसा ही व्यवहार किया जाता है। अतः किसी के साथ बुरा व्यवहार नहीं करना चाहिए।जैसी करनी वैसी